Wednesday, May 12, 2010

lamhon ka guchcha

लम्हों का एक गुच्छा है ज़िन्दगी.
जज़्बातों और हालातों की बंदिश है.
सिलसिला है साँसों का
चल रहा है जो बेमंज़िल.
क़ाफ़िला कुछ लोगों का,
जो हैं हमडगर,
हमसफ़र कोई नहीं.
और एक दिल है,
बवंडर जो अरमानों का है.
एक घटा तन्हाइयों की है,
जो गवाह है तड़प की.
तड़प की लपटों में,
चिता सा, दिल जलता है.
मगर रेशमी हवा ने,
फिर भी उठाया है बीड़ा.
तुम्हारी साँसों की ख़ुश्बू  से
मेरी रूह को महकाने का.
एहसासों कि जुम्बिश,
और लम्हों के इस गुच्छे से 
मैंने तोड़ लिया है एक लम्हा.
और रखा है सहेज के
वो एक लम्हा.
जिसने तुम्हें देकर
दे दी है मंज़िल
साँसों के सिलसिले को.

shukriya

सोच,
किसी कुँए की गहराइयों में
गुम गयी है.
लफ़्ज़,
काग़ज़ पे न उतरने की
ज़िद्द पे अड़ गए हैं.
आज,
जब मैं ढूंढती हूँ,
शुक्रिया कहने का,
अंदाज़ कोई.
धागा,
रिश्ते वाला,
पड़ गया  है तंग.
इस बंदगी का नाम,
क्या है,
कुछ भी नहीं.
जुड़ गयी हो मुझसे
बनके तुम  "आवाज़" कोई.
नहीं जानती
"शुक्रिया"
कहने का अंदाज़ कोई.