Wednesday, July 11, 2018

सामान्यतया

हाँ अब सब सामान्य है
मगर ये सामान्य उतना भी सामान्य नहीं है
कुछ तो है जो पहले सा नहीं है
बदल से गए हैं इस सामान्य के पैमाने
एक बार फिर से हम,
हंस कर मिलेंगे ।
मिलकर बैठेंगे।
बैठकर बतियाएंगे।
खो जाएंगे, हो जाएंगे
वो जो हम हैं, हाँ हम ही हैं
पहले से, सामान्य, सहज
मगर इस बार लगता है
सामान्य ही है कुछ असामान्य ।

Friday, April 27, 2018

ये समय है

ये समय है बढ़ा क़दम, अथक चलना है।
अंधेरे की मशाल बन के ख़ुदी जलना है ।।
ये मौत का कुआँ है, ख़तरों की खाई है ।
या मरना है या कि तुझे ख़ुद संभलना है।।
जो ख़ुद निगल रहा हो अपने नन्हे फूल।
ऐसा है ये चमन, तुझे ज़िंदा निकलना है।।
जिसका दमन किया है उसीके सपूत ने।
तुझे उसी जननी की कोख में पलना है ।।
या बन ज़रा चालाक, ज़रा मौक़ापरस्त।
या बन लकीर का फ़कीर हाथ मलना है।।
जो लड़ रहा तपिश से वो अंकुर फूटेगा।
जो सो रहा आराम से उसे तो गलना है।।
ये समय है बढ़ा क़दम, अथक चलना है।।

Thursday, February 15, 2018

रिश्ते सहूलियत के

हैं काँच के नमूने रिश्ते सहूलियत के।
हो गर्ज़ तभी पूद्दते हैं हाल तबीयत के ।।
क्या लिया क्या दिया किसे दिया कहीं कभी।
रख रख हिसाब जी रहे सभी वसूलीयत के।।
उम्मीद बस वफ़ा की रहे बस एक खुदी से।
क्या कहिए हाल और किसी की खरी नीयत के।।
हम सोचते थे ख़ून मुखातिब है ख़ून से।
रंग चढ़ गए हैं ख़ून पे स्याही के वसीयत के।।
जो पहन मुखौटे दिखा रहे क़रीबियां।
तुम ज़रा भी क़रीब नहीं उनकी असलियत के।।
लगा चुके सभी लगाने थे जो हम पे दांव ।
रिश्ते नहीं मोहताज होते हैं सहूलियत के।।